सीटू का 50वां स्थापना दिवस हिमाचल प्रदेश के सभी जिलों व ब्लॉकों में मनाया गया।

हिमाचल
Spread the love

सीटू का 50वां स्थापना दिवस हिमाचल प्रदेश के सभी जिलों व ब्लॉकों में मनाया गया। इस दौरान सभी यूनियनों द्वारा सीटू का ध्वजारोहण किया गया व मिठाईयां बांट कर खुशी मनाई गई। सभी यूनियनों द्वारा सीटू व मजदूर वर्ग के इतिहास व संघर्षों पर संगोष्ठियों व व्याख्यानों का आयोजन किया गया। शिमला में विजेंद्र मेहरा,रमाकांत मिश्रा,कुलदीप सिंह,किशोरी धटवलिया,विनोद बिरसांटा,बालक राम,रामपुर में बिहारी सेवगी,रोहड़ू में अजय दुलटा,दाड़लाघाट में प्रेम गौतम,किन्नौर में जगत राम,बद्दी-नालागढ़ में एन डी रणौत,परवाणू में ओमदत्त,नाहन में राजेंद्र ठाकुर,हमीरपुर में कश्मीर ठाकुर,जोगिंद्र कुमार,चंबा में सुदेश कुमारी,कांगड़ा में रविन्द्र कुमार व अशोक कटोच,उन में गुरनाम सिंह,मंडी में राजेश शर्मा,भूपिंद्र सिंह,कुल्लू में राजेश ठाकुर,भूप सिंह भंडारी आदि के नेतृत्व में ये कार्यक्रम आयोजित किये गए।

सीटू राज्य महासचिव प्रेम गौतम व सचिव विजेंद्र मेहरा ने संयुक्त प्रेस बयान जारी करके कहा है कि सीटू का 50वां स्थापना दिवस पूरे राज्यभर में धूमधाम से मनाया गया। उन्होंने कहा कि सीटू की स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण होने पर मई 2019 से मई 2020 तक पूरा एक साल विभिन्न कार्यक्रम व गतिविधियां की जाएंगी। यह पूरा एक साल गोल्डन जुबली के रूप में मनाया जाएगा व यह वर्ष संघर्षों व आंदोलनों के रूप में मनाया जाएगा। उन्होंने कहा है कि सीटू के “एकता व संघर्ष” के नारे ने मजदूर वर्ग को भारी संख्या में सीटू के झंडे की ओर आकर्षित किया है व वर्तमान में लगभग 65 लाख सदस्यों के साथ सीटू देश के मेहनतकश व मजदूर वर्ग का सबसे पसंदीदा व लोकप्रिय संगठन बनकर उभरा है।
उन्होंने कहा कि देश में सन 1991 के बाद से लागू की जा रही उदारीकरण,निजीकरण व वैश्वीकरण की नीतियों के कारण लगातार मजदूर वर्ग पर हमले तेज हुए हैं। इन नीतियों से अमीर और ज़्यादा अमीर हुए हैं व गरीब और ज़्यादा गरीब। ये नीतियां पूंजीपति व उद्योगपति परस्त हैं। इन नीतियों से मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ी है। उनके वेतन में महंगाई के अनुरूप बढ़ोतरी नही हुई है व उनका वास्तविक वेतन बढ़ने के बजाए घट गया है। ईपीएफ के पैसे को शेयर मार्केट में लगाया गया है। ईएसआई के 75 हज़ार करोड़ रुपये अंबानी की कम्पनी के हवाले कर दिए गए हैं। बेरोज़गारी व बेकारी की समस्या दिनों-दिन बढ़ रही है। आंगनबाड़ी,मिड डे मील व आशा जैसे सकीम वर्करों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा है। मनरेगा मजदूरों को 250 के बजाए 185 रुपए दिहाड़ी दी जा रही है। सरकारी,अर्ध सरकारी व गैर सरकारी विभागों में मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा है। न्यूनतम वेतन को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के साथ नहीं जोड़ा गया है। 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार मजदूरों को 18 हज़ार वेतन नहीं दिया जा रहा है। इस सबके खिलाफ सीटू आगामी एक वर्ष में गोल्डन जुबली के उपलक्ष्य पर संघर्ष व आंदोलन विकसित करेगा।

Leave a Reply