प्रदेश में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना सरकार का नीति दस्तावेज है- सुरेश भारद्वाज

हिमाचल
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शिमला 14 जून
संस्कृत भाषा के गौरवपूर्ण साहित्य तथा जीवन में उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार द्वारा संस्कृत भाषा को प्रदेश में द्वितीय राजभाषा के तौर पर स्वीकृत किया है, जिससे प्रशासन और पाठ्यक्रम में संस्कृत को और अधिक अधिमान मिलेगा। हिमाचल कला संस्कृत भाषा अकादमी द्वारा गेयटी थियेटर में आयोजित संस्कृत सम्मेलन के अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए शिक्षा, विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश भारद्वाज ने यह विचार व्यक्त किए।

सुरेश भारद्वाज ने कहा कि प्रदेश में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना सरकार का नीति दस्तावेज है, जिसे अमलीजामा पहनाने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा को प्रदेश में वास्तविक रूप में द्वितीय भाषा का दर्जा प्रदान करने के लिए सरकार के साथ-साथ भाषा से जुड़ी संस्थाएं व लोगों को आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग संस्कृत भाषा के प्रति विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न माध्यमों से प्रेरित करेगा। उन्होंने कहा कि विद्यालयों व महाविद्यालयों में संस्कृत विषयों को लागू करने के लिए सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। आवश्यकता के अनुरूप अनुवादकों की व शिक्षकों की नियुक्ति पर भी विचार किया जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने मुख्य अतिथि के तौर पर अपने संबोधन में संस्कृत को भारतीय सभ्यता, इतिहास, संस्कृति और जनजीवन का जीवंत दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा के रूप में स्वीकार होनी अनिवार्य है, जिसका अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि योग की स्वीकार्यता से संस्कृत को संपूर्ण विश्व में मान्यता मिली है।
कार्यक्रम में संस्कृत भारती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री जय प्रकाश गौतम ने अपने संबोधन में संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम भाषा होने के साथ-साथ व्यवहारिक, वैज्ञानिक तथा कम्प्यूटर के लिए सबसे अधिक उपयोगी भाषा बताया।

उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में ज्ञान-विज्ञान, कर्म और उपासना आदि सभी विषयों का समावेश है। उन्होंने कहा कि विश्व के प्रमुख देश आज संस्कृत भाषा का अध्ययन कर रहे हैं तथा इसे विश्वविद्यालय तथा स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल कर रहे हैं, जो भारत के लिए गौरव की बात है।
सचिव, भाषा एवं संस्कृति विभाग डाॅ. पूर्णिमा चैहान ने अपने संबोधन में प्रदेश में विलुप्त हो रही बोलियों के लिए विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक लोक कलाओं के संरक्षण तथा कलाकृतियों के विक्रय और कलाकारों के प्रोत्साहन के लिए प्रदेश के विभिन्न भागों में शिल्प व कला मेलों का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में संस्कृत का प्रचार-प्रसार होने से हिमाचल की संस्कृतनिष्ठ गादी, चिनाली और चामड़ आदि बोलियों का संरक्षण हो सकेगा।
सम्मेलन में डाॅ. ओम प्रकाश शर्मा द्वारा हिमाचल में संस्कृत साहित्य विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने हिमाचल प्रदेश के संस्कृत साहित्य का विस्तृत परिचय दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत का अधिकांश साहित्य हिमालय क्षेत्र में रचा गया है।
इस अवसर पर पूर्व मंत्री डाॅ. राधा रमण शास्त्री, हिमफैड के उपाध्यक्ष गणेश दत्त, कौशल विकास निगम के अध्यक्ष नवीन शर्मा तथा लेखक व साहित्यकार उपस्थित थे।

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