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मंडी,09,मार्च,2025,एप्लास्टिक एनीमिया एक दुर्लभ रक्त रोग है। इसमें बोनमैरो असामान्य स्टेंम कोशिकाएं बनाता है। यह रोग अक्सर पैतृक आधार पर चलता है और आमतौर पर इसका पता बचपन या किशोरवय में लगता है। एनीमिया में शरीर लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी)को पर्याप्त मात्रा में नहीं बना पाता जबकि एप्लास्टिक एनीमिया केवल एनीमिया नहीं है बल्कि इसे पैंसीटोपेनिया कहा जाता है।यह एक मेडिकल स्थिति है जिसमें सभी प्रकार की रक्त कोशिकाओं की संख्या में महत्वपूर्ण कमी हो जाती है।इसमें ल्यूकोपेनिया में सफेद रक्त कोशिकाओं की कमी होती है।एनीमिया में लाल रक्त कोशिकाएं कम हो जाती हैं और थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया में प्लेटलेट्स की कमी होती है।यह सभी समस्याएं बोनमैरो के पूरी तरह से काम बंद करने के कारण होती हैं। रोग का निदान मेडिकल एवं पारिवारिक इतिहास, शारीरिक परीक्षण और जाँच के नतीजों से होता है। इनमें खून की जाँच,बोन मैरो की जाँच और दूसरे परीक्षण शामिल हैं।अगर इलाज न किया जाए तो एप्लास्टिक एनीमिया से जान को खतरा हो सकता है। इसके इलाज में बोन मैरो ट्रांसप्लांट्स,इम्युानोसप्रेसिव थेरैपी,ब्लड ट्रांसफ्यूजन तथा दवाएं शामिल हो सकती हैं।

डॉ राहुल भार्गव प्रिंसिपल डायरेक्टर एवं चीफ हेमैटोलॉजी,हेमैटो ऑन्कोलॉजी व ब्रेन मैरो ट्रांसप्लांट फोर्टिस हॉस्पिटल ने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया व्यक्ति के जीवन को काफी प्रभावित करता है। इसमें थकान महसूस होती है चक्कर आते हैं और रोजमर्रा के काम सामान्य रूप से करने में व्यक्ति थकावट महसूस करता है। इससे मरीज को गंभीर रक्तस्राव या बार बार संक्रमण हो सकते हैं जिससे मरीजों को बार बार अस्पताल में भर्ती होने और खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। इससे उनका रोजाना का जीवन प्रभावित होता है और वे सामाजिक रूप से अलग थलग पड़ सकते हैं।एप्लास्टिक एनीमिया और एनीमिया के लक्षण एक जैसे होते हैं जैसे कि थकान,सिरदर्द, चक्कर आना और चेहरे का पीला पड़ जाना। इसके अलावा एप्लास्टिक एनीमिया के मरीजों को शरीर में संक्रमण से लड़ने वाली सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या कम होने से इन्फेक्शन की स्थिति का सामना करने में काफी परेशानी हो सकती है।यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन यह खासतौर पर 55 से 60 साल के बीच अधिक देखी जाती है।इसके अलावा लूपस जैसी कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां भी एप्लास्टिक एनीमिया को बढ़ावा दे सकती हैं।एप्लास्टिक एनीमिया के मरीजों की उत्तरजीविता दर लगभग 75 प्रतिशत है लेकिन इस बीमारी का जल्दी से जल्दी इलाज कराना बहुत जरूरी है। कुछ गंभीर मामलों में पूरे बोनमैरो के ट्रांसप्लांट की जरूरत हो सकती है। इससे व्यक्ति के जीवित रहने की संभावना बढ़ सकती है।एप्लास्टिक एनीमिया और एनीमिया दोनों ही लंबे समय तक चलने वाली बीमारियां हैं जिनमें काफी वक्त तक अच्छी् गुणवत्ता की देखभाल चाहिये होती है। अगर इन बीमारियों का सही समय पर निदान और रोकथाम इलाज न किया जाए तो इससे मरीजों की जान भी जा सकती हैं। हालांकि अगर सही समय पर और उचित इलाज किया जाए और मरीजों को असरदार दवाएं दी जाएं तो मरीज स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।

By admin

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