हमारी आस्था, और वीरता का प्रतीक यह ऐतिहासिक मेला आज बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। आज सुभाष जी को पत्थर लगा, जिनका रक्त माँ भद्रकाली को अर्पित किया गया — यह परंपरा हमारे देव-विश्वास और बलिदान भावना की सजीव मिसाल है।
धामी का यह पत्थर मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी देव-आस्था, लोक-संस्कृति और एकता का प्रतीक है। हर वर्ष यह मेला हमें हमारी पुरानी परंपराओं की याद दिलाता है, जहाँ भक्ति, साहस और भाईचारा एक साथ दिखाई देते हैं।दूर-दूर से आए भक्त, ग्रामवासी और श्रद्धालु एक परिवार की तरह जुड़े, और पूरे वातावरण में माँ भद्रकाली के जयकारों से गूँज उठी पावन भूमि।
यह मेला हमें सिखाता है कि भक्ति में शक्ति है, और परंपरा में पहचान
हिमाचल प्रदेश के शिमला में हर साल दिवाली के एक दिन पत्थर मेले का आयोजन होता है। शिमला के धामी गांव में लोग एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। मंगलवार को भी मेले का आयोजन किया गया और बड़ी संख्या में लोग मेले में पहुंचे थे।दीपावली पर्व के एक दिन बाद मनाए जाने वाले इस ‘पत्थर मेले’ में स्थानीय गांव और आसपास के गांव के युवाओं की दो टोलियों एक दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए हैं।
दोपहर बाद इस मेले की शुरूआत हुई। मंगलवार को दोपहर साढ़े तीन बजे मेले में पत्थरबाजी का आगाज हुआ और फिर लोग चौक पर एक दूसरे पर पत्थरबाजी करते हुए नजर आए. करीब 26 मिनट तक दो टोलियों में पत्थरबाजी होती रही और फिर एक युवक को पत्थर लगा औऱ उसके खून से देवी मां का राजतिलक किया गया. दरअसल, सदियों से चली आ रही इस परंपरा का जुड़ाव धामी रियासत के राजपरिवार से है। यहां का राजपरिवार पृथ्वी राज चौहान के वंशज है। यहां पर स्थानीयों खूंदों यानी की वीर युवाओं की टोलियां इस पत्थरबाजी में शामिल होती है। सबसे पहला पत्थर राज परिवार की ओर से मारा जाता है, उसके बाद दोनों ओर से तुरंत पत्थरों की बौछार शुरू होती हैव दोनों ओर से पत्थरों की बरसात तब तक बंद नहीं होती, जब तक कि कोई लहूलुहान न हो जाए।
इस पत्थरबाजी में जिस व्यक्ति का रक्त निकलता है, उससे मां भद्रकाली को रक्ततिलक किए जाने की परंपरा है. मान्यता है कि धामी में क्षेत्र में आई आपदाओं से प्रजा को बचाने के लिए इस मेले का आयोजन होता है. राज परिवार के सदस्य जगदीप सिंह ने News 18 को बताया कि मेले की शुरूआत से पहले राजदरबार में सबसे पहले ग्राम देवता देव कुर्गुण की पूजा की जाएगी, ग्राम देवता की पूजा के बाद नरसिंह भगवान की पूजा की जाएगी. पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए की नरसिंह की पूजा की जाती है. उन्होंने बताया कि राजपरिवार के खूंद (टोली) के साथ धगोई, जठौती, कटेड़ू और टुनसू की टोली चलती है और दूसरी ओर से जमोगी खुंद (टोली) आएंगे। उसके बाद विधिपूर्वक राजपरिवार की ओर से पहला पत्थर मारा जाएगा, उसके साथ ही दोनों ओर से पत्थरों की बरसात शुरू हो जाएगी। इस मेले में देव कुर्गुण, नरसिंह और माता भीमकाली के पुजारी हिस्सा लेते हैं।
उन्होंने बताया कि धामी रियासत में सैकड़ों वर्ष पूर्व सुख-शांति के लिए नरबलि की प्रथा थी. हालांकि, बाद में एक रानी ने नरबलि की जगह खून से तिलक लगाने की प्रथा शुरू कीl इस रिसायत की रानी शारड़ा नामक स्थान पर सती हुई थी और उन्होंने सती होने से पहले नरबलि और पशुबलि पर रोक लगाई गई थीl बलि के स्थान पर इस पत्थर के मेले का आयोजन किया जाता है।